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10 August, 2021

10 August

यूनियन जैक को फाड़ने और तिरंगा फहराने के जुर्म में अंग्रेजों ने इनको जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर इनाम घोषित किया था, जानिए ऐसे क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त को !


 


     9 अगस्त का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा महत्व है । इसी दिन 1942 में अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोड़ो नाम से अंतिम आंदोलन छेड़ा गया था । जिसे अगस्त क्रांति दिवस का नाम दिया गया । यह अगस्त क्रांति दिवस प्रत्येक भारतवासी को राष्ट्रभक्ति के जज्बे से सराबोर होने की सीख देता है । क्योंकि इस आंदोलन से ब्रितानिया हुकूमत की चूलें हिल गई थी ।

भारत को अग्रेंजो की गुलामी के गहन गहवर से मुक्त कराने के लिए जिन तमाम वीर सपूतों ने समय समय पर क्रांति का विगुल फूंका उन्हीं में एक नाम राजबली यादव का भी है । जिनकी चर्चा के बिना अगस्त क्रांति की चर्चा अधूरी रह जायेगी । वास्तव में राजबली यादव स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वाचल व अवध के योद्धाओं के महानायक थे । आजादी की लड़ाई में इस सपूत की अहम भूमिका रही । बाद में सक्रिय राजनीति में दखल दिया ।कालांतर में किसानों, मजदूरों व दलितों शोषितों के आदर्श बने । इस दौरान सामंती ताकतों की आंखो की किरकिरी बने रहे । 



राजबली यादव ने गुलामी के दौर में अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया और आजादी के बाद अवध की धरती पर देशी अन्ग्रेजो यानी सामंतो के उत्पीड़न के शिकार किसानों, मजदूरो व अन्य शोषित तबकों की आवाज जीवन पर्यत बुलंद किया ।  9 अगस्त  यानी अगस्त क्रांति दिवस की वर्षगाँठ पर इस महा सपूत की पुण्यतिथि है ।

भारत मां के अमर सपूतों की एक लम्बी फेहरिस्त में शामिल राजबली यादव का जन्म 7 नवम्बर 1906 को अवध की धरती अम्बेडकरनगर जनपद की जलालपुर तहसील के अरई गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था । चूंकि इनके पिता रामहर्ष यादव एक किसान थे इसलिए उनके साथ रहकर किसानों और मजदूरों की पीडा से वे बचपन में ही वाकिफ हो गये थे । राजबली यादव अभी कक्षा पांच में पढ ही रहे थे कि सन् 1919 में हुए जलियावाला बाग हत्याकाण्ड ने इनके बाल मन को उद्वेलित कर दिया । महज तेरह वर्ष की अवस्था में इनके अंतस में हुए क्रांति के बीजारोपण ने इन्हें क्रांतिकारी बना दिया । फिर किशोरो की टीम बनाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाम के मन में क्रांति की भावना जगाते हुए सन् 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होकर सक्रिय क्रांतिकारी बन गये । फिर उन्होने कभी पीछे मुडकर नही देखा । अंग्रेजो के विरूद्ध तत्समय के किसी भी आन्दोलन में वे हमेशा आगे रहे। सन् 1930 में पहली बार जेल जाने के बाद जेल की दहशत भी समाप्त हो गयी।

सन् 1931 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन से लेकर सन् 1942 के भारत छोडो आन्दोलन तक सभी में राजबली यादव ने बढ चढकर हिस्सा लिया । इस दौरान उनकी जेल यात्राओं का क्रम थमा नहीं और प्रदेश की विभिन्न जेलों की दर्जनों बार यात्राएं की । इस दौरान ब्रितानी हुक्मरानों द्वारा दी गयी कठोर यातनाओ और ढाये गये जुल्मों सितम का डटकर मुकाबला भी किया । इस दौरान आजादी के तराने गाते हुए तिरंगे की शान बढ़ाया । जेलों मे तनहाई की सजा के दौरान फिरंगियों के कोडे से इनका बदन तमाम बार लहू लुहान हुआ मगर मन विचलित नही हुआ। साहस और आत्मबल की बदौलत फैजाबाद, हरदोई, जौनपुर, लखनऊ और उन्नाव जेलों की मजबूत दीवारें भी उन्हें ज्यादा दिनो तक कैद न रख सकी । तत्कालीन फैजाबाद जनपद के पूर्वाचल में स्थित राजेसुल्तानपुर की बाग में जनसभा के दौरान भारतीय नागरिकों पर जुल्म ढाने वाले दरोगा को मारने और गाजे बाजे के साथ उसका शव सरयू में प्रवाहित करने जैसे साहसिक कार्य में क्रांतिकारी बसुधा सिंह के साथ राजबली यादव प्रमुख रूप से शामिल रहे । राजेसुल्तानपुर थाने पर लगे यूनियन जैक को फाडने और तिरंगा फहराने के जुर्म में तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने श्री यादव को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी करते हुए इन पर इनाम भी घोषित किया था । मगर वे पुलिस की पकड से दूर रहे । इस दौरान उनके घर की कुर्की कर परिजनों को भी प्रताडित किया गया । एक बार लगातार कई दिनों तक होती रही बरसात में ब्रितानी पुलिस ने इनका घर घेर रखा था और इनकी बीमार मां व भतीजे को घर में घुसने नही दिया । नतीजा यह हुआ कि बाहर खडे खडे भीगते हुए ही दोनो ने दम तोड दिया ।


क्रांतिकारी पक्ष की ही तरह इनका सृजनात्मक पक्ष भी मजबूत रहा हैं । अंग्रेजी हुक्मरानों की दमनात्मक कार्रवाई, सामंतशाही के उत्पीड़नात्मक रवैये तथा भारतीय नागरिकों की लाचारी को आधार बनाकर श्री यादव ने जेल में रहते हुए गद्य व पद्य साहित्य का सृजन भी किया । जिसमें कमजोरों को ताकत देने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है । जेल की त्रासदी भरे जीवन काल में राजबली यादव ने अवधी व भोजपुरी मिश्रित बोली में ‘‘धरती हमारी है‘‘ नाटक लिखा जो आगे चलकर जनजागरण का हथियार बना ।

संघर्षो के इसी कड़ी में 15 अगस्त 1947 को आजादी की किरण फूटने के बाद कई वर्षो तक किसानो और मजदूरों के हक में देखा गया सपना जब साकार होता न दिखा तो राजबली यादव ने सामंतशाही के विरूद्ध दूसरा जनान्दोलन नाटक मंडली बनाकर शुरू किया । तत्समय चल रही चकबंदी प्रक्रिया में सामंतवादी शक्तियों के दबाव मे किसानो व मजदूरों की उपेक्षा के खिलाफ जनान्दोलन चलाते हुए श्री यादव ने कम्युनिष्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण किया और बिना पैसा लिए उत्तर प्रदेश के तमाम गांवो समेत देशभर में धरती हमारी हैं नाटक का मंचन कर लोगों को जगाया । उनके इस चर्चित नाटक के दौरान सामंती ताकतों ने अनेकों बार उन पर कातिलाना हमला कराकर उनका उत्पीड़न किया । अनेकों बार फर्जी मुकदमों में फसाकर सामंतवादियों ने उनकी आवाज दबाने का भरसक प्रयास किया । फिर भी इस क्रांतिबीर की क्रांति यात्रा अनवरत जारी रही ।


समय के साथ हर गरीब की आवाज बन चुके राजबली यादव सन् 1967 के आम चुनाव में तत्कालीन मया - अमसिन विधानसभा क्षेत्र से कम्युनिष्ट पार्टी के टिकट पर विधायक भी चुने गये । उनकी बढ़ती लोकप्रियता तथा संघर्ष शक्ति से जल उठी सामंती ताकतों ने साजिश के तहत एक मुकदमें में फसाकर सजा दिला दिया । परिणामतः उन्हें विधानसभा की सदस्यता से भी त्यागत्र देना पड़ा, लेकिन नाटक के जरिए उन्होंने जागरूकता अभियान जारी रखा और फिर कभी चुनाव नही लड़े । उनका अंतिम समय पैतृक गांव अरई में बीता । जहां 9 अगस्त 2000 को उन्होंने अंतिम सांस ली । एक सच्चे देश भक्त व स्वाधीनता सेनानी के रूप में स्थापित हुए राजबली यादव के बताए रास्ते पर चलने वाले उनके अनुयायी उन्हें शारीरिक रूप में बिदा करने के बाद भी यश काया में उन्हें जिंदा मान रहे है । वास्तव में राजबली यादव के दिल में मातृभूमि व राष्ट्र के प्रति प्रेम व समर्पण का ऐसा जज्बा था जिसने उन्हें सुख की नींद नहीं सोने दिया । जब सारा देश सोता था तब वे अपनी मण्डली के साथ अंग्रेजों के विरूद्ध योजनाएं बनाते थे और फिर सबके साथ जागते हुए उसे मूर्तरूप देते थे । जब आजादी मिली तब उन्होंने यही जज्बा देश के गरीबों मजदूरों और किसानों के प्रति दिखाया ।

इस रणबांकुरे से जुडा सर्वाधिक दुखद पहलू यह है कि जीते जी अंग्रेजो और सामन्ती ताकतों से सदा जूझते रहे राजबली यादव ने जब आंखे मूंदी तो उनके पैतृक गाव में स्मारक आदि को कौन कहे गांव में समाधि के लिए दो गज जमीन के भी लाले पड़े हुए हैं । वास्तव में राजबली यादव जैसे व्यक्तित्व का जन्म युगों में में होता है । जिन मूल्यों को लेकर उन्होंनें संघर्ष किया था, आज उनका क्षरण हो रहा है ।

               - (राकेश यादव, लखनऊ)

11 June, 2021

11 June

लालू यादव के जीवन गाथा राउर आपन बोली मा पढ़ीं आ फोटू देखीं .....

 


लालू प्रसाद यादव (जनम 11 जून 1948) एगो भारतीय राजनीतिक नेता बाड़ें । यादव, भारत के बिहार राज्य से हवें आ राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष बाड़ें आ बिहार राज्य के मुख्यमंत्री आ पंद्रहवीं लोकसभा में सांसद आ भारत के रेलमंत्री रह चुकल बाने ।

रेत पर बनी कलाकृति


लालू प्रसाद यादव पटना विश्वविद्यालय के छात्र राजनीति से आपन राजनीतिक कैरियर के सुरुआत कइलें आ 1977 में जनता पार्टी के कैंडिडेट के रूप में 29 बरिस के उमिर में, तब तक के सभसे कम उमिर वाला लोक सभा सांसद चुनल गइलें । साल 1990 में यादव बिहार के मुख्यमंत्री बनलें आ 1997 में चारा घोटाला में भ्रष्टाचार के आरोप में उनके इस्थीपा देवे के परल । 1997 से 2005 ले इनके मेहरारू राबड़ी देवी बिहार के मुख्यमंत्री रहली, लालू के आलोचक लोग एकरा के लालू के अप्रत्यक्ष सरकार के रूप में देखे ला । बिहार में लालू के शासन के कानून बिहीन राज आ जंगल राज के नाँव दिहल जाला । लमहर समय के बाद साल 2015 में लालू यादव के दल नीतीश कुमार के साथे बिहार बिधान सभा में पावर में आइल बाकी साल 2017 के जुलाई में लालू यादव, राबड़ी देवी आ तत्काल में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव (लालू यादव के बेटा) के खिलाफ एन्फोर्समेंट डाइरेक्टरेट आ सीबीआई के द्वारा कई गो मामिला दर्ज करे के बाद नीतीश कुमार इनके पार्टी के पाछे हटा के, भाजपा के साथ मिल के सरकार बना लिहलें ।

लालू और नीतीश


     भीड़ खींचे वाला, चल्हाँक आ मनोरंजक नेता के रूप में पहिचान वाला लालू यादव पर प्रदेश में जाति आधारित राजनीति के बढ़ावा देवे वाला भी मानल जाला, आ इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामिला दर्ज बाने 3 अक्टूबर 2013 के इनके पाँच साल के सजा आ ₹25 लाख के जुर्माना सीबीआई अदालत द्वारा चारा घोटाला मामिला में कइल गइल, आ दुबारा एही मामिला में 23 दिसंबर 2017 के साढ़े तीन साल के सजा सुनावल गइल, जबकि इनके सांसद बेटी मीसा भारती के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति के मामिला एन्फोर्समेंट डाइरेक्टरेट द्वारा दर्ज कइल गइल बा, आ चारा घोटाला के तीन गो मामिला अभिन भी इनका पर अदालत में लंबित बाने ।

पछतावा की मुद्रा में


(लालू प्रसाद यादव के 74वें जन्मदिन पर भोजपुरी भाषा में विशेष)

परिवार के साथ

साइकिल चलाते हुए

अभिवादन करते हुए

शरद यादव के साथ

जॉर्ज फर्नांडिस के साथ

समाजवादी नेता के साथ

धरना प्रदर्शन करते हुए

भाषण देते हुए


05 June, 2021

05 June

जाति-पाति तोड़क मण्डल" के संस्थापक सदस्य व प्रख्यात साहित्यकार सन्तराम बीए को याद करके हैं



     तुलसी दास जी के "जे वर्णाधम तेलि, कुम्हारा, स्वपच, किरात, कोल, कलवारा" में से कुम्हार जाति मे जन्मे महानतम समाज सुधारक एवं साहित्यकार सन्तराम बीए जी 31 मई 1988 को स्मृतिशेष हुए ।

     सन्तराम बीए जी 14 फरवरी 1887 ई को पंजाब सूबा के होशियारपुर जनपद के बसी गांव में एक कुम्भकार जाति में पैदा हुये ऐसे महानतम समाज सुधारक हैं जिन्होंने 1909 में तमाम जातिगत टिप्पड़ियों को सुनते हुये बीए की डिग्री हासिल कर सौ के आसपास किताबों की रचना की व अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन एवं उनमें लेखन किया । 

      सन्तराम बीए जी ने 1922 में परमानन्द जी के साथ मिलकर "जाति-पाति तोड़क मण्डल" नामक ऐतिहासिक व परिवर्तनकारी संगठन का निर्माण किया । इस संगठन के वार्षिक अधिवेशन को भारत रत्न बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी को 1936 में सम्बोधित करना था । बाबा साहब द्वारा अपने भाषण की जब ड्राफ्टिंग संस्था को भेजी गयी तो उसके कई सदस्यों को वह पसन्द नहीं आई जिस नाते बाबा साहब इसमें अपना ब्याख्यान तो न दे सके लेकिन वह भाषण बाबा साहब के "जाति उच्छेद" या "एनिहिलेशन आफ कास्ट" नाम से प्रकाशित हो,उनकी अनमोल कृतियों में से एक बन गया ।

       सन्तराम बीए जी ने अपने संगठन "जाति-पाति तोड़क मंडल"के मंशानुसार अपने सभी बच्चों की शादियां जाति तोड़कर कीं।सन्तराम बीए जी की पुस्तक "हमारा समाज" व "मेरे जीवन के अनुभव" भारतीय सामाजिक इंतजामात को समझने हेतु उनकी अद्वितीय रचनाएं हैं । 31 मई 1988 को महामना सन्तराम बीए जी ने अपनी अंतिम सांस ली । हम आज अपने इस महानतम पुरखा को पूरी शिद्दत से याद करते हुये उन्हें श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं ।

"जाति-पाति तोड़क मण्डल" के संस्थापकों में से एक व प्रख्यात साहित्यकार सन्तराम बीए जी को स्मृति दिवस पर कोटिशः नमन ।

     - चन्द्रभूषण सिंह यादव, देवरिया

30 May, 2021

30 May

30 मई 1857 को हुआ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज

 


आज का इतिहास -

  30 मई 1857  को निश्चित हुआ प्रथम भारतीय आजादी का संघर्ष  "रोटी व कमल"  था सांकेतिक निशान -


"उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,

जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।

जगमगा रहे हैं मकबरे उनके,

बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।"


    राव तुलाराम के नेतृत्व में सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया । शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार और झांसी में भी फैल गया । अंग्रेजों ने पंजाब से सेना बुलाकर सबसे पहले दिल्ली पर अधिकार किया । 21 सितंबर, 1857 ई. को दिल्ली पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया, परन्तु संघर्ष में 'जॉन निकोलसन' मारा गया और लेफ्टिनेंट 'हडसन' ने धोखे से बहादुरशाह द्वितीय के दो पुत्रों 'मिर्ज मुगल' और 'मिर्ज ख्वाजा सुल्तान' एवं एक पोते 'मिर्जा अबूबक्र' को गोली मरवा दी । लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत निश्चित 30 मई 1857 ई. को हुई । यहां के क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा ब्रिटिश रेजिडेंसी के घेराव के बाद ब्रिटिश रेजिडेंट 'हेनरी लॉरेन्स' की मृत्यु हो गई । हैवलॉक और आउट्रम ने लखनऊ को दबाने का भरकस प्रयत्न किया, लेकिन वे असफल रहे । एक वर्ष तक लखनऊ ब्रितानियों से आज़ाद  रहा, आखिर में कॉलिन कैंपवेल' ने गोरखा रेजिमेंट के सहयोग से मार्च, 1858 ई. में शहर पर अधिकार कर लिया । वैसे यहां क्रांति का असर सितंबर तक रहा ।

    1857 का संग्राम एक साल से ज्यादा समय तक चला । इसे 1858 के मध्य में कुचला गया । 8 जुलाई, 1858 को आखिरकार कैनिंग ने घोषणा किया कि विद्रोह को पूरी तरह दबा दिया गया है ।

 (राकेश यादव, लखनऊ)